Sun. Apr 11th, 2021

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-दीपक दुआ… (Featured in IMDb Critics Reviews) किसी गांव की प्राथमिक पाठशाला में एक मास्साब (मास्टर साहब) आए। आए तो पाठशाला की हालत खस्ता थी। असली की जगह नकली टीचर पढ़ा रहे थे। बच्चे भी बस मिड-डे मील के लालच में आते, घटिया खाना खाते और निकल लेते। मास्साब ने सुधार लाने शुरू किए तो धीरे-धीरे पाठशाला के साथ-साथ वहां के बच्चों, उस गांव और गांव के लोगों तक में सुधार आने लगा। कुछ समय बाद जब मास्साब वहां से विदा हुए तो पूरे गांव की आंखों में आंसू थे। पढ़ने-पढ़ाने और शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर आने वाली फिल्मों में अक्सर उपदेश रहते हैं या फिर नाटकीयता। लेकिन यह फिल्म थोड़ी-सी अलग है। इसमें यह नहीं बताया जाता कि पढ़ाई कितनी ज़रूरी है या फिर जीवन में आगे बढ़ने के लिए कैसे पढ़ा जाए। बल्कि यह फिल्म बताती है कि पढ़ाना कितना ज़रूरी है और बच्चों के जीवन को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें कैसे पढ़ाया जाना चाहिए। बतौर लेखक आदित्य ओम और शिवा सूर्यवंशी सराहना के हकदार हैं। दीपक दुआ- फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट ‘सिनेयात्रा डॉट... Read More
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